ब्राज़ील का आगामी राष्ट्रपति चुनाव केवल लुला दा सिल्वा और फ्लेवियो बोलसोनारो के बीच सत्ता का संघर्ष नहीं है। यह उस गहरे संकट का चुनाव भी है, जिसमें देश के सर्वोच्च न्यायालय, केंद्रीय बैंक और वित्तीय तथा प्रतिस्पर्धा-नियामक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। अगला राष्ट्रपति न केवल सरकार चलाने की चुनौती विरासत में पाएगा, बल्कि उन संस्थाओं को भरने का अधिकार भी पाएगा जो मौद्रिक नीति, बाज़ार नियमन और संविधान की व्याख्या तय करती हैं। रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय बैंक के दो निदेशक पद—जिनमें आर्थिक नीति से जुड़ा पद भी शामिल है—जनवरी से खाली हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय, प्रतिभूति-नियामक सीवीएम और प्रतिस्पर्धा-आयोग कैड में भी रिक्तियाँ बनी हुई हैं।
ब्राज़ील की यह स्थिति इतिहास से अलग नहीं है। 1964 के सैन्य तख्तापलट के बाद देश पर लगभग दो दशकों तक सैन्य शासन रहा, जिसने कार्यपालिका में असाधारण शक्ति केंद्रित की और राजनीतिक अधिकारों को कुचल दिया। 1985 में लोकतंत्र की बहाली और 1988 के संविधान ने सत्ता को विभाजित करने, स्वतंत्र संस्थाओं को सुदृढ़ करने और फिर से तानाशाही की संभावना को रोकने का प्रयास किया। परंतु आज वही संस्थागत संतुलन एक नए संकट में बदल गया है: राष्ट्रपति नामांकन करता है, पर कांग्रेस उन्हें स्वीकृति देने या रोकने के लिए राजनीतिक दबाव का हथियार बना देती है।

वर्तमान सत्ता-संघर्ष का केंद्र कांग्रेस है। ब्राज़ील की कांग्रेस अब केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं रही; वह कार्यपालिका की नियुक्तियों पर नियंत्रण करके सरकार की कार्यक्षमता को प्रभावित कर रही है। सीनेट के नेतृत्व द्वारा नामांकनों को लंबे समय तक रोके रखने और स्वीकृति को राजनीतिक सौदेबाज़ी से जोड़ने से राष्ट्रपति की स्वतंत्रता सीमित हुई है। यह सामान्य जाँच-संतुलन नहीं, बल्कि संस्थागत अवरोध की राजनीति है। खासकर तब, जब नियामक निकायों के गठन में देरी से आर्थिक नीति, विलय-अधिग्रहण समीक्षा और पूंजी बाज़ार की देखरेख प्रभावित हो सकती है।
इस संघर्ष की जड़ में बजट और विधायी शक्ति का पुनर्वितरण भी है। कांग्रेस के स्थानीय विकास-आवंटन 2018 में संघीय विवेकाधीन खर्च के 7.5 प्रतिशत थे, जो 2025 में बढ़कर 21 प्रतिशत हो गए। पिछले वर्ष कांग्रेस ने 178 सांसद-प्रस्तावित विधेयक पारित किए, जबकि सरकार के केवल 50 विधेयक पारित हुए। इससे स्पष्ट है कि सत्ता का केंद्र राष्ट्रपति भवन से कांग्रेस की ओर खिसक रहा है। इसलिए अगले राष्ट्रपति की वास्तविक ताकत उनके चुनावी वादों से कम और कांग्रेस के साथ उनके सहअस्तित्व से अधिक तय होगी।
आने वाले चुनाव में राष्ट्रपति के साथ पूरा 513-सदस्यीय निचला सदन और सीनेट के दो-तिहाई सदस्य भी चुने जाएँगे। इसलिए यह चुनाव निर्णायक है: सीनेट की संरचना यह तय करेगी कि सर्वोच्च न्यायालय, केंद्रीय बैंक और नियामक संस्थाओं में आने वाले नियुक्तियों को मंजूरी मिलेगी या नहीं। अगले राष्ट्रपति के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय के कम से कम तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति का अवसर भी आ सकता है, जिससे न्यायपालिका का भविष्य दशकों तक प्रभावित हो सकता है।
भविष्य का खतरा यह है कि ब्राज़ील लोकतांत्रिक दिखने वाली, पर संचालनहीन सरकार की ओर बढ़ सकता है। यदि नियुक्तियाँ लगातार राजनीतिक सौदेबाज़ी का बंधक बनती रहीं, तो तकनीकी और स्वतंत्र संस्थाएँ राजनीतिक पुरस्कार का माध्यम बन जाएँगी। इससे नीति-निर्माण धीमा होगा, नियामक निर्णय अनिश्चित होंगे और न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठेंगे। ब्राज़ील के लिए असली परीक्षा यह नहीं कि कौन राष्ट्रपति बनता है, बल्कि यह है कि चुनाव के बाद भी देश की संस्थाएँ खाली कुर्सियों पर अटकी रहती हैं या उन्हें योग्य, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से भरा जाता है।
