सिख धर्म के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी महाराज के अनुयायी प्रतिवर्ष उनकी जयंती को ‘प्रकाश पर्व’ या ‘प्रकाश उत्सव’ के रूप में बड़े हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाते हैं। बिहार के पटना शहर में जन्मे गुरु गोविंद सिंह जी ने अपने संपूर्ण जीवन और विचारों के माध्यम से समाज में समानता, न्याय तथा अन्याय और अत्याचार के खिलाफ निडर होकर खड़े होने की प्रेरणा दी। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार उनकी जयंती प्रतिवर्ष दिसंबर या जनवरी महीने में आती है, हालांकि सिख समुदाय में इस पावन पर्व का आयोजन पारंपरिक नानकशाही कैलेंडर (Nanakshahi Calendar) की तिथियों के आधार पर ही किया जाता है।

गुरु गोविंद सिंह जी का ऐतिहासिक योगदान अद्वितीय रहा है, जिसमें सन 1699 में ‘खालसा पंथ’ की स्थापना सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। उन्होंने सिखों को एक सशक्त पहचान देते हुए ‘पंज ककार’ (केश, कड़ा, कृपाण, कंगा और कच्छा) धारण करने का नियम बनाया। उन्होंने अपने जीवनकाल में जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई और अपने जीवन के अंतिम चरण में ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ को सिखों का शावाह और अंतिम गुरु घोषित किया।
प्रकाश पर्व के अवसर पर देश-विदेश में श्रद्धालुओं द्वारा नगर कीर्तन और भव्य जुलूस निकाले जाते हैं, जिनमें लोग भक्ति संगीत और शबद-कीर्तन गाते हुए शामिल होते हैं। इस दिन गुरुद्वारों को विशेष रूप से सजाया जाता है, जहां ‘अखंड पाठ’ (गुरु ग्रंथ साहिब का निरंतर पाठ) और विशेष अरदास का आयोजन होता है। उत्सव की पूर्णता विशाल लंगर सेवा से होती है, जिसमें बिना किसी भेदभाव के सभी धर्मों और वर्गों के लोगों को सम्मानपूर्वक भोजन कराया जाता है। गुरु गोविंद सिंह जी का जीवन त्याग, साहस और मानवता की रक्षा का एक अनूठा संदेश देता है।
