टोक्यो: निसान के पूर्व प्रमुख कार्लोस घोसन के हाल ही में जापान छोड़कर लेबनान भाग जाने के बाद देश की न्यायिक प्रणाली और ज़मानत से जुड़े नियमों पर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं। जापान में जहां एक तरफ इस मामले को लेकर कानूनी सुधारों और अभियुक्तों को दी जाने वाली ज़मानत में और कड़ाई बरतने पर चर्चा शुरू हो गई है, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वहां की सख्त न्याय प्रणाली की आलोचना भी हो रही है।

वित्तीय अनियमितताओं और पद के दुरुपयोग के आरोपों का सामना कर रहे कार्लोस घोसन सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देकर जापान से लेबनान पहुंच गए। वहां पहुंचकर उन्होंने एक बयान में कहा कि वह किसी भी प्रकार के अपराध से भाग नहीं रहे हैं, बल्कि जापान की “पक्षपातपूर्ण और अन्यायपूर्ण” न्याय प्रणाली से खुद को बचाने के लिए यह कदम उठाने पर मजबूर हुए हैं। घोसन के अनुसार, उन्हें वहां न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर बंधक बनाकर रखा जा रहा था।
घोसन के इस कदम के बाद जापान के भीतर कानूनी विशेषज्ञों और पूर्व सरकारी वकीलों (प्रॉसीक्यूटर्स) का मानना है कि इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि हाइ-प्रोफाइल मामलों में ज़मानत की शर्तों को बेहद कड़ा किया जाना चाहिए। कानूनी जानकारों का तर्क है कि इस प्रकार के मामलों में ढील देने से अभियुक्तों के देश छोड़कर भागने का जोखिम बढ़ जाता है, इसलिए आने वाले समय में ज़मानत से जुड़ी नीतियों में और अधिक सख्ती देखने को मिल सकती है।
दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि जापान की आपराधिक न्याय प्रणाली में लंबे समय तक हिरासत में रखकर पूछताछ करने की प्रथा आरोपी के बुनियादी अधिकारों का हनन करती है। फिलहाल, इस हाई-प्रोफाइल पलायन के बाद जापान सरकार और उसकी न्यायिक संस्थाएं प्रक्रियात्मक खामियों की समीक्षा करने में जुटी हैं।
